Wednesday, October 28, 2009

ब्राण्ड नेम न लिखूं तो क्या करूं??

मेरे एक मित्र हैं सर्जन. हड्डियों के. अच्छे हैं लिहाजा खूब भीड़-भाड़ भी रहती है. पिछले दिनों मुझे कुछ तकलीफ हुई तो मैं उनके पास गया. यद्यपि मेरे घर से काफी दूर है उनका अस्पताल, लेकिन दो सौ रुपये बचाने का लोभ मैं संवार नहीं सका. ऊपर से मित्र तो हैं ही. पहुंचा, उन्होंने देखा, थोड़ी गंभीर मुद्रा बनाई, और कागज पर कुछ शब्द घसीटने लगे. मुझे लगा कि एक अदद एक्स-रे तो जरूर लिखा होगा और भी पता नहीं क्या होगा उनकी कलम से निकलता हुआ. खैर मेरे हाथ को थोड़ा पकड़ कर हिलाया-डुलाया और एक बैन्डेज लगा दिया. बोले आठ-दस दिन हाथ को आराम देना, बस. काफी का आर्डर दे चुके थे. बैठना आवश्यक था, मुझे लग रहा था कि मैं अनावश्यक रूप से उनके काम में खलल डाल रहा हूं, मैंने आशंका जताई तो वे बोले कि चलो "तू आ गया है तो कम से कम थोड़ी देर का मिल गया है, वरना वही रूटीन".

हम लोग बचपन के साथी हैं, एक दूसरे की टांग खिचाई का मौका ढूंढ ही लेते हैं. मैं ने काफी के सिप भरते भरते सवाल दाग दिया कि "अभी मेरी जगह कोई और होता तो तू क्या करता, ईमानदारी से बताना?" उत्तर मिला "एक एक्स-रे, विटामिन और कैल्सियम तथा दर्द निवारक गोलियां और बैन्डेज तो होना ही था" फिर मैंने एक सवाल और दाग दिया "तुम लोग दवाइयों के जेनेरिक नाम क्यों नहीं लिखते आखिर दवाई तो वही होती है जो उसका जेनेरिक नाम है न कि ब्राण्ड नेम?" पहला उत्तर था कि "इससे याद रखने में आसानी होती है, दवा देने वाले केमिस्ट को भी आसानी होती है और ऊपर से लोगों को भी सुविधा होती है." मैने फिर बाल की खाल निकाली तो थोड़ा सा भड़क गया बोला "साले तुम लोग हमें बेवकूफ समझते हो, तुम लोग (जिसमें मैं भी शामिल हूं) पांच रुपये की चीज पचास में खरीदते हो तो कुछ नहीं कहते, चीनी के दाम दुगुने हो जाते हैं कुछ नहीं कहते, किसान को जिस चीज के पांच रुपये मिलते हैं उसे पच्चीस में खरीदते हो, नकली दूध-तेल-घी, मिलावटी डीजल-पेट्रोल खरीदते हो कुछ नहीं कहते, सरकारे गलत काम कराती हैं, वोट देकर चले आते हो, लाला सौ ग्राम की पैकिंग के दाम में बढोत्तरी नहीं करता बस पैकिंग में कमी करता है, कभी चिल्लाये. आटो-टैक्सी वाले रेट बढा़ देते हैं कभी कुछ कहा. सरकारें खुद भी भू-माफियाओं को संरक्षण देती हैं जो किसानों की जमीन औने-पौने दामों पर बिना खरीदे ही पावर आफ अटार्नी लेकर दस हजार रुपये मीटर बेचती हैं, कभी तुम लोगों ने कोई आन्दोलन किया.

स्कूल-कालेज डोनेशन लिये वगैर अडमीशन नहीं करते, फीस अनाप शनाप बढा़ देते हैं, तुम लोगों के कभी दर्द हुआ. कम्पनी एक रुपये की लागत की चीज पचास रुपये में बेचती है. दवा कम्पनियों के ऊपर क्यों कोई शिकंजा नहीं है, क्यों पालिसियां बदल दी जाती हैं. क्या सरकारों को यह दिखाई नहीं देता? फिर मैं क्यों बेवकूफी करूं? जब सब के सब लाखों के गिफ्ट लेते हैं, कैश में काइन्ड में और भी कई तरीकों से, विदेशों के टूर लेकर, तो मैं क्यों न ब्राण्ड नेम सजेस्ट करूं, मुझे कौन सा भारत रत्न मिल जायेगा? और मेरे दोस्त यहां तक तो फिर भी ठीक है, जब यात्रा करते समय स्टेशन पर पीने को पानी नहीं मिलता तो बीस रुपये की बोतल खरीदना पड़ती है. बिजली का मीटर ठीक है, लेकिन फिर भी महीने में देना पड़ता है, नक्शा के हिसाब से बनवाया, लेकिन बीस हजार देना पड़ा. पुलिस-प्रशासन वाले आ जायें तो हर चीज में छूट देनी पड़ती है. अपना विभाग भी छूटा नहीं है. अखबार वाले भी हर दूसरे तीसरे महीने विज्ञापन लेने के लिये कारिंदा भेज देते हैं. और मुझे मकान नहीं बनाना, मुझे गाड़ी से नहीं चलना, मुझे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिलानी चाहिये क्या? और ऐसा करने लगूंगा तो बाद में तू ही कहेगा कि तुझे पागल कुत्ते ने काटा था क्या? इसलिये मत पूछ कि ब्राण्ड नेम क्यों लिखता है.

7 comments:

Nirmla Kapila said...

बाज़ारवाद् के युग मे आप भी क्या सवाल कर बैठे सही है अब डाक्टर लोग भी लोगों के मसीहा कब तक बने रहेंगे धुभकामनायें

P.N. Subramanian said...

आपके मित्र की सोच अपनी जगह बिलकुल सही है. आभार.

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

भारत का उद्धार ऐसे ही होगा, न रहेंगे गरीब(दवा के आभाव में) न रहेगी गरीबी.

राज भाटिय़ा said...

यह गलत है, अगर मेरे मुहल्ले के आधे लोग चोर हो ओर चोरी डकेती डाल कर अमीर बने हो तो क्या मै भी चोरी करूं? जो गलत है उसे गलत कहने मै डर केसा?मै गरीब रहना पसंद करुंगा.्लेकिन अपना जमीर नही बेचूगां
धन्यवाद

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

ब्राण्डनेम कभी सुखदायी
और
कभी दुखदायी।

बढ़िया लिखा है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

हाँ भाई, लंका में सब बावन गज के!

ab inconvenienti said...

If you can't beat them..... join them.

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